शनिवार, 6 मार्च 2021

Rudrashtakam

रुद्राष्टकम्


 नमामीशमीशाण निर्वाण रूपं विभुं व्यापकं ब्रह्म वेद: स्वरुपम् ।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्‌ ॥


निराकामोंकारमूलं तुरीयं गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ।

करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहम्‌ ॥


तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम् ।

स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारू गंगाल्लसद्भाल बालेन्दु कंठे भुजंगा ॥


चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालम् ।

मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥


प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानु कोटि प्रकाशम् ।

त्रयःशूल निर्मूलनं शूल पाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भाव गम्यम् ॥


कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनान्ददाता पुरारी ।

चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥


न यावद् उमानाथ पादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम ।

न तावद् सुखं शांति सन्ताप नाशं प्रसीद प्रभो सर्व भूताधि वासं ॥


न जानामि योगं जपं नैव पूजा न तोऽहम्‌ सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ।

जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभोपाहि आपन्नामामीश शम्भो ॥


रुद्राष्टकं इदं प्रोक्तं विप्रेण हरितोषये

ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शंभो प्रसीदति ॥


॥ इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ॥